Monday, May 20, 2013

















खीझ ................Quarter life crisis

वो जो अक्स बना था दुनिया का किताबों में,
वो जो हमने चाँद देखा था ख़्वाबों में,
झूठ था वो जो आँसू तेरी पलकों पे रह गया,
सपना था जो पानी बन के बह गया.

बस में मेरे काँधे पे सर रख के सोया था,
खिड़की से आती बारिश ने तेरे बालों को भिगोया था,
तेरी हथेली पे अपनी किस्मत दिखी थी,
तेरे लिये वो ग़ालिब वाली ग़ज़ल भी लिखी थी,
थोड़ा था सच थोड़ा झूठ कह गया,
नीयत पूरी थी इश्क़ अधूरा रह गया.

ज़माने से नहीं शिकवा मुझे,
ना ही क़िस्मत से कोई गिला है,
मिला मुझे ख़ुदा भी और विसाल-ए-सनम भी मिला है.
लेकिन दिल में वो विश्वास सा कुछ था - ढह गया,
कच्चा मकान.... पहली बारिश में बह गया.

दौलत भी है और उसने नाम भी कमाया है,
सुना है सर पे उसके हुक्मरानों का भी साया है,
बाज़ार के कायदों को सीख कर वो आगे बढ़ गया,
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने  में रह गया................

                                                                       
                                                                             विनय

This post is inspired by the last line "मैं दोस्तों से हाथ मिलाने  में रह गया" which I read somewhere a long time ago......

Monday, September 3, 2012

Age is a high price to pay for maturity.


















ज़िन्दगी देती है हर रोज़ एक सबक,
हर गुज़रते पल के साथ होते हैं हम बड़े I
बड़े होने का ये तजुर्बा ... मांगता है-
मासूमियत की कीमत I
वो सब लगने लगता है बेमानी,
जो कभी जीने का सबब होता था I
माँ नहीं डांटती अब देर से  घर आने पर,
न पिताजी मांगते हैं पैसों का हिसाब I
घर के पास वाला बूढा पीपल,
अब एक पेड़ है महज़ I
झूठ बोलने पर अब नहीं लगता डर,
कपड़ो की गर्द अब दिल पर छायी है I
'व्यक्तित्व विकास' के इस क्रम में सोचता हूँ,
हम आखिर बड़े ही क्यों होते हैं....


                                                   विनय

Sunday, July 22, 2012

विडम्बना 2




मुस्कुराते हुए उसने फिर मुझे देखा..
इस बार उसकी हंसी में याचना के साथ चंद सवाल भी थे,
सवाल भले ही न रहे हों इतने महत्वपूर्ण,
जितने कि कलमाड़ी और राजा थे,
न ही वो इतने sensational थे कि,
जगह पाते अखबारों के मुखपृष्ठ पर,
और कोई सवांददाता, संवाद के संवेग से,
परोसता उसे टीवी पर दिन भर.
उनमें देशहित की भी चिंता न रही हो भले ही.
और रहे भी कैसे?
स्वहित कि रक्षा में देशहित भी आडम्बर ही लगता है.
इस दारुण दुःख में कितना आसान है,
उसके लिए ये मुस्कुराहट ओढ़ना?
या कि उस चेहरे के पीछे स्वयं विधाता हँस रहा है?
उन आँखों पर जो राह में बिछ जाती हैं,
"माननीयों" के इस्तेकबाल में.
और हो जाती हैं घृणा से छोटी,
जब उनका लकी दीखता के सड़क के बच्चों के साथ खेलता,
पास के ही स्कूल में लिखा था..
"हम सब एक ईश्वर की संतान हैं".

                                                                             विनय

Saturday, January 7, 2012

बाज़ार



क़ैद में सरस्वती, लक्ष्मी.. क़ैद में हैं विचार,
क़ैद हुआ जनतंत्र ,राज करता भ्रष्टाचार I
सत्ता के पाश में जकड़ी है लेखनी ,
जंग लगी निब ,थके शब्द, बेबस बेदम ....लाचार I
पांचसितारा में धनाढ्यों को बदहजमी है,
सड़क किनारे भूखा भगवान रो रहा जार-जार I
अर्जुनों  की भीरुता ,दु:शासनों को शह दे रही है,
आखिर कब तक करेंगे कृष्ण का इन्तजार?
बोलियाँ लग रही हैं ,हर चीज बिकाऊ है,
व्यापारी हैं शासक ,सत्ता है व्यापार I
कभी फुरसत मिले तो बाजार चले जाना,
२-४  पैसे हों तो, सच्चाई खरीद लाना.......

                                                     विनय 

This post is inspired by Mr. जवाहर 'मुकेश'

Friday, September 30, 2011

विडम्बना

मेरे गाँव से शहर को जाने वाली ये सड़क,
कटी फटी...धूल धूसरित..
नंगे पाँव जिस पर दौड़ा हूँ मैं कई बार..

गाँव से शहर को जोड़ने के क्रम में...
जिसने कई घरों को तोड़ा है...

पथराई आँखें आज भी बिछी रहती हैं इस पर...
किसी के इन्तजार में..

उन्हें ये नहीं पता
की ये सड़क सिर्फ जाने के लिए बनी है.........

                                        विनय

क्रांति

कभी कभी मैं सोचता हूँ,
कि छिन्न-भिन्न कर दूं इस व्यवस्था को,
ले आऊँ एक नयी क्रांति

लेकिन जैसे ही इसके लिए उठता हूँ,
मेरी माँ आ जाती है..
पूछती है कि क्या मेरा ध्यान पढाई में नहीं लग रहा,
और डांट के बिठा देती है मुझे...

फिर रात के दस या ११ बजे..
मैं और मेरी क्रांति
किताब पर सर रखे ऊंघ रहे होते हैं....

                                  विनय