खीझ ................Quarter life crisis
वो जो अक्स बना था दुनिया का किताबों में,
वो जो हमने चाँद देखा था ख़्वाबों में,
झूठ था वो जो आँसू तेरी पलकों पे रह गया,
सपना था जो पानी बन के बह गया.
बस में मेरे काँधे पे सर रख के सोया था,
खिड़की से आती बारिश ने तेरे बालों को भिगोया था,
तेरी हथेली पे अपनी किस्मत दिखी थी,
तेरे लिये वो ग़ालिब वाली ग़ज़ल भी लिखी थी,
थोड़ा था सच थोड़ा झूठ कह गया,
नीयत पूरी थी इश्क़ अधूरा रह गया.
ज़माने से नहीं शिकवा मुझे,
ना ही क़िस्मत से कोई गिला है,
मिला मुझे ख़ुदा भी और विसाल-ए-सनम भी मिला है.
लेकिन दिल में वो विश्वास सा कुछ था - ढह गया,
कच्चा मकान.... पहली बारिश में बह गया.
दौलत भी है और उसने नाम भी कमाया है,
सुना है सर पे उसके हुक्मरानों का भी साया है,
बाज़ार के कायदों को सीख कर वो आगे बढ़ गया,
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया................
This post is inspired by the last line "मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया" which I read somewhere a long time ago......

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