ज़िन्दगी देती है हर रोज़ एक सबक,
हर गुज़रते पल के साथ होते हैं हम बड़े I
बड़े होने का ये तजुर्बा ... मांगता है-
मासूमियत की कीमत I
वो सब लगने लगता है बेमानी,
जो कभी जीने का सबब होता था I
माँ नहीं डांटती अब देर से घर आने पर,
न पिताजी मांगते हैं पैसों का हिसाब I
घर के पास वाला बूढा पीपल,
अब एक पेड़ है महज़ I
झूठ बोलने पर अब नहीं लगता डर,
कपड़ो की गर्द अब दिल पर छायी है I
'व्यक्तित्व विकास' के इस क्रम में सोचता हूँ,
हम आखिर बड़े ही क्यों होते हैं....
विनय
