Monday, September 3, 2012

Age is a high price to pay for maturity.


















ज़िन्दगी देती है हर रोज़ एक सबक,
हर गुज़रते पल के साथ होते हैं हम बड़े I
बड़े होने का ये तजुर्बा ... मांगता है-
मासूमियत की कीमत I
वो सब लगने लगता है बेमानी,
जो कभी जीने का सबब होता था I
माँ नहीं डांटती अब देर से  घर आने पर,
न पिताजी मांगते हैं पैसों का हिसाब I
घर के पास वाला बूढा पीपल,
अब एक पेड़ है महज़ I
झूठ बोलने पर अब नहीं लगता डर,
कपड़ो की गर्द अब दिल पर छायी है I
'व्यक्तित्व विकास' के इस क्रम में सोचता हूँ,
हम आखिर बड़े ही क्यों होते हैं....


                                                   विनय

Sunday, July 22, 2012

विडम्बना 2




मुस्कुराते हुए उसने फिर मुझे देखा..
इस बार उसकी हंसी में याचना के साथ चंद सवाल भी थे,
सवाल भले ही न रहे हों इतने महत्वपूर्ण,
जितने कि कलमाड़ी और राजा थे,
न ही वो इतने sensational थे कि,
जगह पाते अखबारों के मुखपृष्ठ पर,
और कोई सवांददाता, संवाद के संवेग से,
परोसता उसे टीवी पर दिन भर.
उनमें देशहित की भी चिंता न रही हो भले ही.
और रहे भी कैसे?
स्वहित कि रक्षा में देशहित भी आडम्बर ही लगता है.
इस दारुण दुःख में कितना आसान है,
उसके लिए ये मुस्कुराहट ओढ़ना?
या कि उस चेहरे के पीछे स्वयं विधाता हँस रहा है?
उन आँखों पर जो राह में बिछ जाती हैं,
"माननीयों" के इस्तेकबाल में.
और हो जाती हैं घृणा से छोटी,
जब उनका लकी दीखता के सड़क के बच्चों के साथ खेलता,
पास के ही स्कूल में लिखा था..
"हम सब एक ईश्वर की संतान हैं".

                                                                             विनय

Saturday, January 7, 2012

बाज़ार



क़ैद में सरस्वती, लक्ष्मी.. क़ैद में हैं विचार,
क़ैद हुआ जनतंत्र ,राज करता भ्रष्टाचार I
सत्ता के पाश में जकड़ी है लेखनी ,
जंग लगी निब ,थके शब्द, बेबस बेदम ....लाचार I
पांचसितारा में धनाढ्यों को बदहजमी है,
सड़क किनारे भूखा भगवान रो रहा जार-जार I
अर्जुनों  की भीरुता ,दु:शासनों को शह दे रही है,
आखिर कब तक करेंगे कृष्ण का इन्तजार?
बोलियाँ लग रही हैं ,हर चीज बिकाऊ है,
व्यापारी हैं शासक ,सत्ता है व्यापार I
कभी फुरसत मिले तो बाजार चले जाना,
२-४  पैसे हों तो, सच्चाई खरीद लाना.......

                                                     विनय 

This post is inspired by Mr. जवाहर 'मुकेश'