Saturday, January 7, 2012

बाज़ार



क़ैद में सरस्वती, लक्ष्मी.. क़ैद में हैं विचार,
क़ैद हुआ जनतंत्र ,राज करता भ्रष्टाचार I
सत्ता के पाश में जकड़ी है लेखनी ,
जंग लगी निब ,थके शब्द, बेबस बेदम ....लाचार I
पांचसितारा में धनाढ्यों को बदहजमी है,
सड़क किनारे भूखा भगवान रो रहा जार-जार I
अर्जुनों  की भीरुता ,दु:शासनों को शह दे रही है,
आखिर कब तक करेंगे कृष्ण का इन्तजार?
बोलियाँ लग रही हैं ,हर चीज बिकाऊ है,
व्यापारी हैं शासक ,सत्ता है व्यापार I
कभी फुरसत मिले तो बाजार चले जाना,
२-४  पैसे हों तो, सच्चाई खरीद लाना.......

                                                     विनय 

This post is inspired by Mr. जवाहर 'मुकेश'

1 comment:

  1. WAH..what a hard truth...you wrote so elegantly and so simply...
    it's the beauty of a poet....''KAVIRA KHADAA BAZAAR ME''...

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