Friday, September 30, 2011

विडम्बना

मेरे गाँव से शहर को जाने वाली ये सड़क,
कटी फटी...धूल धूसरित..
नंगे पाँव जिस पर दौड़ा हूँ मैं कई बार..

गाँव से शहर को जोड़ने के क्रम में...
जिसने कई घरों को तोड़ा है...

पथराई आँखें आज भी बिछी रहती हैं इस पर...
किसी के इन्तजार में..

उन्हें ये नहीं पता
की ये सड़क सिर्फ जाने के लिए बनी है.........

                                        विनय

क्रांति

कभी कभी मैं सोचता हूँ,
कि छिन्न-भिन्न कर दूं इस व्यवस्था को,
ले आऊँ एक नयी क्रांति

लेकिन जैसे ही इसके लिए उठता हूँ,
मेरी माँ आ जाती है..
पूछती है कि क्या मेरा ध्यान पढाई में नहीं लग रहा,
और डांट के बिठा देती है मुझे...

फिर रात के दस या ११ बजे..
मैं और मेरी क्रांति
किताब पर सर रखे ऊंघ रहे होते हैं....

                                  विनय