
मुस्कुराते हुए उसने फिर मुझे देखा..
इस बार उसकी हंसी में याचना के साथ चंद सवाल भी थे,
सवाल भले ही न रहे हों इतने महत्वपूर्ण,
जितने कि कलमाड़ी और राजा थे,
न ही वो इतने sensational थे कि,
जगह पाते अखबारों के मुखपृष्ठ पर,
और कोई सवांददाता, संवाद के संवेग से,
परोसता उसे टीवी पर दिन भर.
उनमें देशहित की भी चिंता न रही हो भले ही.
और रहे भी कैसे?
स्वहित कि रक्षा में देशहित भी आडम्बर ही लगता है.
इस दारुण दुःख में कितना आसान है,
उसके लिए ये मुस्कुराहट ओढ़ना?
या कि उस चेहरे के पीछे स्वयं विधाता हँस रहा है?
उन आँखों पर जो राह में बिछ जाती हैं,
"माननीयों" के इस्तेकबाल में.
और हो जाती हैं घृणा से छोटी,
जब उनका लकी दीखता के सड़क के बच्चों के साथ खेलता,
पास के ही स्कूल में लिखा था..
"हम सब एक ईश्वर की संतान हैं".
विनय